पत्ताखोर
by Madhu Kankariya
212 pages· ISBN 9788126722433
About
स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज में हमने जहाँ विकास और प्रगति की कई मंजिलें तय कि हैं, वहीं अनेक व्याधियाँ भी अर्जित की हैं। अनेक सामाजिक कारणों से हम कुछ ऐसी बीमारियों से घिरे हैं जिनका कोई सिरा पकड़ में नहीं आता।
युवाओं में बढती नशे और ड्रग्स की लत एक ऐसी ही बिमारी है। एक तरफ समाज कि रग-रग में तनाव, घुटन, कुंठा और असंतोष व्याप रहा है, युवाओं को हर तरफ अंधी और अवरुद्ध गलियाँ नजर आ रही हैं, लगातार खुलते बाज़ार की चकाचोंध से मध्य और निम्नमध्यवर्ग का युवा स्तब्ध है। नतीजा भटकाव और विकृति।
नशे के लिए व्यक्ति खुद जिम्मेदार है, नशे के व्यापारी जिम्मेदार हैं या हमारी सामाजिक- आर्थिक वास्तविकताएँ, कहना कठिन है। इस उपन्यास में इन्हीं सवालों से दो चार हुआ गया है।
युवाओं में बढती नशे और ड्रग्स की लत एक ऐसी ही बिमारी है। एक तरफ समाज कि रग-रग में तनाव, घुटन, कुंठा और असंतोष व्याप रहा है, युवाओं को हर तरफ अंधी और अवरुद्ध गलियाँ नजर आ रही हैं, लगातार खुलते बाज़ार की चकाचोंध से मध्य और निम्नमध्यवर्ग का युवा स्तब्ध है। नतीजा भटकाव और विकृति।
नशे के लिए व्यक्ति खुद जिम्मेदार है, नशे के व्यापारी जिम्मेदार हैं या हमारी सामाजिक- आर्थिक वास्तविकताएँ, कहना कठिन है। इस उपन्यास में इन्हीं सवालों से दो चार हुआ गया है।
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